कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना चरन कमल रज कहुं सबु कहई

बीकानेर। यूं तो रामायण के एक-एक प्रसंग में भावना, प्रेम, सद्भाव, मर्यादा और अनुशासन की शिक्षा देता है, लेकिन एक प्रसंग ऐसा भी है जो श्रोताओं, दर्शकों और भगवान श्रीराम के भक्तों को भावविभोर कर देता है। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगती है और भ्रातृत्व प्रेम की इस गाथा को पूरी दुनिया गर्व से पढ़ती है। ये प्रसंग है भरत मिलाप। स्थानीय गर्वमेन्ट प्रेस रोड स्थित गोपीनाथ मंदिर में रविवार को रामलीला महेंद्र सिंह राजपुरोहित की स्मृति में शहरी जन कल्याण सेवा संस्थान एवं श्री राम रामलीला कमेटी द्वारा मंचित रामलीला में पांचवे दिन स्थानीय कलाकारों ने दशरथ मरण, श्रीराम-केवट संवाद व भरत मिलाप की लीला का मंचन किया।

यहां भरत मिलाप के प्रसंग में मौजूद भक्तों की आंखों से आंसु रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मंच पर श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के अलावा अयोध्या के नगर वासी विराजमान थे। लक्ष्मण को पता चलता है कि उनका अनुज भारी सैन्य बल के साथ उनकी ओर बढ़ रहा है, तो वे गुस्से से लाल पीला होकर कहते हैं, जैसी मां वैसा बेटा। लेकिन भरत सेना के साथ इसलिए आ रहे थे, क्योंकि उन्हें भय था कि जंगल में उनके भाई और भाभी को कुछ नुकसान तो नहीं हुआ।

प्रभु श्रीराम से मुलाकात के बाद भरत को मनाने का मंचन, भाइयों के बीच का संवाद और अंत में भरत का सशर्त अयोध्या वापसी इत्यादि के मंचन भी दिखाए गए। वहीं केवट-राम संवाद में केवट कहता है कि मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।

श्रीराम ने केवट से नाव मांगी, पर वह लाता नहीं है। वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है। वह कहता है कि पहले पांव धुलवाओ, फिर नाव पर चढ़ाऊंगा। अयोध्या के राजकुमार केवट जैसे सामान्यजन का निहोरा कर रहे हैं। यह समाज की व्यवस्था की अद्भुत घटना है। उधर, नौनिहाल में भरत-शत्रुघ्न को सूचना देकर बुलाया जाता है।

अयोध्या में भरत को रानी कैकेई से सारा वृृतांत सुनते हैं। जिसके बाद भरत श्रीराम को अयोध्या वापस लाए जाने के लिए गुरू वशिष्ठ से विचार विमर्श किया जाता है। भरत-शत्रुघ्न गुरू वशिष्ठ के साथ चित्रकूट पहुंचते हैं। श्रीराम व भरत गले मिलते हैं, और सारा वृृतांत श्रीराम को बताया जाता है। भरत श्रीराम को अयोध्या पहुंचने के लिए आग्रह किया जाता है। श्रीराम पिता के वचनों के खातिर अयोध्या जाने से मना कर देते हैं।

भरत श्रीराम की खड़ाऊं सिर पर रखकर अयोध्या की ओर रवाना होते हैं। आयोजक खुशालचंद व्यास ने बताया कि प्रभू राम का पात्र गोपाल, सीता के पात्र में सुरेश कुमार,लक्ष्मण की भूमिका राम राजपुरोहित तथा भरत की भूमिका तरूण शर्मा,तथा शत्रुघ्न की भूमिका केतन सिंह ने निभाई।

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