ये क्या हुआ  ! घोटालों के भूत नाचने-गाने लगे … इन्हें भेंट बिन जो मिले, होय न पूरन काज

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नाचने-गाने
अचकचाते हुए एक-एक कर घोटालों के भूत जागे और चुनावी रणभेरी के सुर में सुर मिला कर नाचने-गाने लगे… इन्हें भेंट बिन जो मिले, होय न पूरन काज ! चुनावी समर में आरोपों प्रत्यारोपों का शोर ही इतना ज्यादा है कि कुंभकर्ण भी जाग जाए! फिर नए नकोर, ताजातरीन घोटालों के भूतों की क्या मजाल कि वे न जागें! बड़े दादा के कमल-दल ने जमीन घोटाले को छींटे मार कर जगाया तो छुटकू बाबा ने नोटबंदी बंदी की तहों में घोटाला-भूत का अंदेशा होने का उद्घोष कर दिया। केवल उद्घोष । उसे मंच पर तो वे समय पर लाएंगे।जाहिर है  वह समय  जो अब तक नहीं आया जिसे  छुटकू बाबा पिछले कई महीनों से बराबर  इसका उद्घोष करते रहे हैं ।  वह समय  2019 के  चुनावी समर के दौरान आएगा  इस बात को  आमजन  भली-भांति समझ रहा है।  यह भी समझ रहा है  कि ऐसे घोटाले के भूतों को  समय-समय पर ही क्यों जगाकर नचाया जाता है  । यदि यह घोटाले के भूत  सचमुच में है  तो झाड़ फूंक के  ताबीज बांधकर  इन्हें  काल कोठरी में बंद रखना चाहिए । लेकिन घोटालों के भूतों को जगाने वाले हैं  की  इनको खेल बनाकर  अपना तमाशा जारी रखना चाहते हैं । बीते दिनों के बुरे अनुभवों को भुला देते हैं । अच्छे दिनों के सिवाय वैसे भी अब कौन कुंभकर्ण के बीते वक्त को याद करता है! हां, अपने बीते अच्छे दिनों को केवल बुजुर्ग ही याद करते हैं। लेकिन विडंबना है कि उनकी बात अधिकांश युवा वर्ग सुनता नहीं।
घोटालों के भूत भी किसी की नहीं सुनते। घोटालों के भूत अपने पुरखों की बातें जरूर याद करते कहते हैं – आस्था और सेवा भावना से ‘‘गुरुजनों’’ या ‘‘’समाजसेवियों’ को दान दक्षिणा देना तो परंपरा रहा है। जिसका फलक बढ़ाकर और स्वरूप बिगाड़कर आज भ्रष्टाचार की प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई है। उसी भ्रष्टाचार की लीला का शीर्षक है – घोटाला । लेकिन लोग हैं कि मानते नहींं, कहते हैं  ‘गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा।’  बीते ताही बिसार दे आगे की सुधि ले।  लेकिन आईना जब बोलने लगता है तब ‘‘बंदे को बंदे में नहीं बात में दम’’ दिखाई देता है। आज भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए गली कूंचे से जन सैलाब ‘‘राजभवनों’’ की ओर बढ़ रहा है । लेकिन कुछ लोग अपने ‘‘ सुनहरे बीते जमाने को याद कर “अपना लेनदेन का काम’’ जारी रखे हुए हैं।
पात्र लोगों को दान दक्षिणा के बिना उनका जीवनयापन प्रभावित होता था क्योंकि वे सही मायनों में समाज की भरसक सेवा करते थे और करते हैं। बड़े बुजुर्गों ने ऐसे समाज सेवकों एवं विद्वजनों के बीच कुछ और लोगों को भी दान दक्षिणा का आदी बनते देखा तो नई पीढ़ी तक संदेश कुछ इस तरीके से पहुंचा –
गुरु, बेद और जोतसी, देव, मंत्री, अरु राज।
इन्हें भेंट बिन जो मिले, होय न पूरन काज।
अब बीते वक्त की इन बातों में विद्वानों के साथ शामिल मंत्री और राज वर्ग के ‘‘बंदो’’ को ‘‘दम’’ नजर आता है तो ‘‘तहलका’’ मचता ही है। और तहलके के साथ-साथ चुनावी समर के शोर से घोटालों के भूत जागकर नाचने-गाने लगते हैं।

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