ये क्या हुआ ! अगला करता रहा, पिछले पर गिरता रहा… !

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ये क्या हुआ !

ये क्या हुआ !

आज कामदारों और नामदारों का एक-दूसरे पर तंज कसने का सिलसिला थम-सा जाए… काश ऐसा हो कि फिर ऐसी नजीर न दोहराई जाए…। राजनीतिक जगत और लोकतंत्र के महाकुंभ “आम चुनाव” की दुंदुभि जल्दी ही फिर गूंजेगी। बहरहाल विधानसभा चुनावों के तहत प्रचार का शोर तो आज थमा।  लेकिन *हम लोग* जानते हैं कि “वादों की बारात” निकलती रहेगी। क्यूंकि बारातें “मंडप” तक पचहुंचने के लिए निकलती है, बीच राह थमने के लिए नहींं । यदि कुछ देर  बीच राह थमती है तो ( मध्यावधि चुनाव) बाराती दुगुने जोश से नाचते ही हैं, दूल्हे को घोड़ी से उतार कर उसे भी नचाते है। कई बार तो घोड़ियां भी नृत्य-कला का प्रदर्शन करती हैं। और सभी जानते हैं कि सड़कों पर जहां-जहां घोड़ी-घोड़ियां चलते-रुकते हैं वहां-वहां अस्तबल की मानिंद लीद के ढेर लगते ही हैं। आगे-पीछे हुए अनियंत्रित घोडे-घोड़ियां जो लीद करते हैं उससे बचना पीछे वाले के लिए मुश्किल ही नहींं नामुमकिन हो जाता है । और यह भी सच है कि अस्तबल का सफाई कर्मचारी कितनी भी साफ सफाई करता रहे, अस्तबल में लीद अपना वजूद बनाए ही रखती है। आखिर घोड़े-घोड़ियों को “राजे महाराजाओं” को सवारी कराने और बारातों में बींद “राजा” को लादने के सिवाय करना भी क्या पड़ता है? लीद ! लेकिन यह तो आज की स्थिति है जब युद्ध में घोड़ों का इस्तेमाल नहीं के बराबर और वह भी बरसों में कभी युद्धाभ्यास के दौरान किया जाने लगा है। सवारी के काम भी अब घोड़े पर निर्भर नहीं रहे। तो फिर अस्तबल भी क्यों वजूद में बने हुए हैं? खैर… खैरियत रहे… लेकिन ऐसी कहावतें कोई आज प्रचलित नहीं हुई बल्कि कितने ही बरसों से लोक प्रचलन में हैं। क्यों? ऐसे सवाल का जवाब आज की नागरीय व्यवस्था में भी ढूंढ़ें तो शायद मिल जाए…।
एक खामी दूर करने के लिए प्रशासन और राज मिल कर योजनाओं पर योजनाएं बनाते हैं और फिर सिलसिला शुरू होता है योजनाओं की खामियां दूर करने का। एक खामी तो दूर हुई नहीं कई खामियां खड़ी हो गई। लेकिन “राजकुर्सी” पर बैठने वाला कभी विचलित नहीं होता । मानो उसे न आए की खुशी न  गए का गम ।  पता नहीं यह कब, क्यूं, कहां किसने किसके लिए कहा था – आए की खुशी न गए का गम! मतलब – हर हालत में संतोष होना। सच है, कुर्सीधारी बहुत सन्तोषी होते हैं। वे जनता के लाभ का श्रेय दूसरों को धकिया कर झपटते हैं।  और हानि होने पर पिछले पर लाद देते हैं।  मालूम नहीं, सच है या यह घोषणा भी कागजी रहेगी कि बीकानेर में रेल फाटकों की समस्या का समाधान शीघ्र होगा!  यहां ध्यान जाता है ‘‘नेताजी के वादों’’ पर। माशाअल्लाह ! वादों का पुलिंदा पीठ पर लादे नेताजी इस लोक ( तंत्र) में चलते कैसे हैं? और फिर नये-नकोर वादे भी करते चलते हैं! ! हर चुनाव जनता की यादाश्त की परीक्षा होता है।  मगर हम मतदाताओं की बड़ी संख्या अपनी यादाश्त महंगाई पर खर्च हो चुकी होने और पानी निकासी, कचरे के ढेर, शहर के बाजारों में हर घंटे-आधे घंटे में  यातायात जाम में फंसने, निराश्रित “पालतू” पशुओं की मार से चोटिल होने के कारण वादों की मरिचिका के पीछे ही दौड़ लगाती है !

जानकार लोग तो यहां तक कहते हैं कि अगले करते हैं, पिछले पर लादते हैं। बात सच लगती है … है या नहीं इस पर शोध के लिए भी ‘‘खर्च’’ होना चाहिए! क्या इसीलिए बड़े ज्ञानी कह गए हैं कि बड़ों की भूल छोटों को भुगतनी पड़ती है! फिर यह कहने से भी तो लोग चूकते नहीं कि किसी काम की भलाई बुराई उन लोगों पर ही आती है, जो उसे अंत में करते हैं। लेकिन… काज राज का हो या निजी क्षेत्र का… अच्छे काम का श्रेय लेने वाले तो कतारबद्ध मिलते हैं और काम बिगड़ते ही पिछलों पर लाद देने के हजारों बहाने सामने आते हैं। बहानों की इस बारात को विराम  मिलेगा या नहीं…  यह देखेंगे “हम लोग” … आने वाले दिनों में। बाकी सब खैरियत है

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