पिछली हार के लिए जनता को मलाल या डॉ कल्ला जिम्मेदार

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बीकानेर। पिछले 10 साल से विधानसभा चुनाओं में कांग्रेस के भारी भरकम्प प्रत्याशी डॉ.बुलाकीदास कल्ला को चुनाव में दो बार हार का सामना करना पडा है। लोगों को इस बात का मलाल आज भी है प्रजातंत्र में जनादेश सर्वो प्रिय हैं हार जीत होती रहती है। पर दुखः की बात यह है कि डॉ.कल्ला की इस पराज्य के पीछे शहर की जनता नहीं बल्कि डॉ.कल्ला के घर में बैठे वे कांग्रेसी ही जिम्मेवार है जिन्हें खुद विधायक की कुर्सी के स्वपन आने लग गये थे। आज उनकी हालत ये हो रही है कि घर के धोबी घर के रहे न घाट के। पर नुकसान बीकानेर शहर के विकास को जरूर हो रहा है। जिसके लिए डॉ. कल्ला सहित उन तथा कथित कांग्रेसीयों को बीकानेर शहर की जनता कभी माफ करने वाली नहीं है। कारण डॉ.कल्ला की सबसे बड़ी भूल यह रही की उन्होंने अपने साथ के लोगों पर विश्वास किया परन्तु वे लोग बीकानेर शहर के विकास को डंस गये। समाचार पत्र देवेन्द्र वाणी ने एक बार नहीं बल्कि कई बार उपरोक्त मामलों में डॉ.बी.डी.कल्ला को समाचार प्रकाशित करके चेताया भी था। कि डॉ.कल्ला इन लोगों से बचे। मगर विडम्बना रही कि उन्होंने कभी भी इन समाचारों की तरफ ध्यान नहीं दिया। इस बात का खामयाजा आज बीकानेर शहर को भुगतना पड़ रहा है।

उल्लेखनीय रहे कि डॉ.कल्ला ने सदैव बीकानेर कांग्रेस में स्व.रामरतन कोचर परिवार को पनाह दी और वरिष्ठ पत्रकार ललित आजाद को गोलियों के दम पर शहर अध्यक्ष से हरवा कर स्व.रामसिंह कोचर को जिला कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया उसी परिवार के बल्लभ कोचर ने गये विधानसभा चुनाव में डॉ.कल्ला को आँख दिखाई? इसके अलावा डॉ.कल्ला की राजनीति के चलते शहर से एडवोकेट मोहम्मद मुश्ताक भाटी सरकार के महकमों के सरकारी वकील मनोनित रहें और लाखों रूपयें के वारे न्यारे किए, वे तो खुल्ल कर ही डॉ.कल्ला के सामने चुनाव मैदान में उतर गये थे किन्तु वर्तमान में आज ये महाषय भी इनके साथ खडे़ है, जिसका चुनाव खर्च भले ही किसी पुड़ी वाले के ढ़ाबे से आये हो मकसद मात्र यही था, की डॉ. कल्ला को हराना है ऐसे में विष्वास कहा तक हो? जिन्हे डॉ.कल्ला ने नगर विकास न्यास का न्यासी बनवाया, और जिला कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनवाकर जनता के सामने अपना उतराधिकारी बतलाया पर उनको लेकर भी लोगों का कहना है कि उन्होंने पूर्व विधानसभा क्षेत्र से पार्टी टिकट नहीं मिलने के कारण से आधे अधुरें मन से डॉ.कल्ला का साथ दिया, शहर का बहुचर्चित आर पार मंच भी डॉ.कल्ला का विरोधी रहा पर आज नेता जी और मंच दोनों पक्षकार है। आज भी इस बात का जिन्दा सबुत लोगों के सामने हैं।

कोई हारे व कोई जीते इस बात से किसी निष्पक्ष समाचार को कोई लेना देना नहीं होता पर हार-जीत का असर जब शहर के विकास पर आता है तो लोगों की मांग पर समाचार पत्रों को भी अपना नैतिक धर्म निभाना पड़ता हैं। डॉ.कल्ला तो चुनाव हार गये और पार्टी में कोई बड़ा नेता ऐसा दिखाई नही दे रहा है जो कार्यकर्ताओं की किसी पीड़ा को समझ सके। संगठन के वर्तमान में प्रभावी लोग मात्र छप्पाश रोग से ग्रस्त है, और डॉ.कल्ला परिवार के पास कोई कार्यकर्ता जाता तो जबाव मिलता बताते है ‘‘कि क्या करो भायला आपों तो चुनाव हारग्या’’, ‘‘फैर भी थारे काम खातिर देखस्या’’ पर होता कुछ भी नहीं है। न सता में भागीदारी और न ही यहां पार्टी संगठन सक्रिय है कार्यकर्ताओं का दुखड़ा तो अब इस बात को लेकर है कि आने वाला समय बीकानेर विधानसभा चुनावों का है और पार्टी के बड़े नेता आज भी उदासीन बैठे है, एैसे में क्या कांग्रेस पिछले 10 सालों के जख्मों पर जीत का मल्हम लगा पाएगी।

कार्यकर्ता आज संगठन के सुद्धी करण की बात कर रहे है। क्या पार्टी के दबंग नेता जर्नादन कल्ला समय रहे इस बात पर गौर फरमायेगें ?

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