लक्ष्मी का सदुपयोग ही श्रेयस्कर : मुकेश अग्रवाल

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मुकेश अग्रवाल

लक्ष्मी का सदुपयोग ही श्रेयस्कर है। नहीं तो लक्ष्मी का दूसरा नाम चंचला है। वह धन का दुरुपयोग होता देखकर उस स्थान को छोडऩे में जरा भी देर नहीं लगाती। दीपावली मनने के पीछे कई कारण सामने आते है। पांच दिन का यह त्यौहार हर दिन नया रंग और नया रूप लेकर आता है। इन सबके बावजूद इस त्यौहार व्यापक रूप से जिस नजरिए से देखा जाता है, वह है लक्ष्मी की प्राप्ति। जो दरिद्र है वह यह सोचकर पूजन करता है कि उसकी दरिद्रता दूर हो जाए। जो मध्यमवर्गीय है वह और भी उच्च वर्ग में जाने के लिए बड़े धूमधाम से लक्ष्मीपूजन करता है। सदियों से चली आ रही यह मान्यता यह तो साफ तौर पर जाहिर करती है कि मनुष्य ने हमेशा या हर बार यह संकल्प लिया है कि वह आर्थिक रूप से समृद्ध होना और रहना चाहता है। इस साल फिर दीपावली आ गयी, मनुष्य के मन में घर कर चुके समृद्धि के समने को एक नया रूप देने के लिए।

मुकेश अग्रवाल

 

दीपावली एक है मगर मान्यताएं अलग-अलग मगर स पर भारी है मानव मन की आर्थिक समृद्धि की इच्छा। एक व्यक्ति नहीं, एक परिवार नहीं, एक समुदाय नहीं बल्कि पूरा मानव समाज अपनी आर्थिक समृद्धि चाहता है। दीपावली मनाने की परंपरा क से शुरू हुयी, इसकी अलग-अलग मान्यताएं है। उनमें जाने पर भटकाव की गुंजाइश है। दीपावली मनाने की परंपरा के बारे में जहां तक देखे, ज्यादातर कारण या यूं कह लीजिये सबसे बड़ा कारण मानव समाज की आर्थिक समृद्धि की इच्छा है। सदियों पुराने इस त्यौहार के दौरान दुनिया में कई बदलाव आए। मानव आदि शब्द से मुक्ति पा गया। राजवंश आए और गए, बड़े-बड़े समृद्धशाली नगर बने और बिगड़े, किन्तु मनुष्य की यह चिरप्रार्थित आकांक्षा पूरी नहीं हुयी है, या यूं कह लीजिएं पूरी हुई तो भी उसकी सीमा खत्म नहीं हुयी, शायद यहीं कारण है कि वह आज भी लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस पर्व के आने के कई दिन पहले से इसके स्वागत की तैयारियां करता नजर आता है।
न जाने किस आदमी के मन में किस शुभ मुहूर्त में लक्ष्मी पूजन से आर्थिक समृद्धि की बात आयी थी? पंडितों ने इस पर्व का इतिहास खोजने का प्रयत्न किया है। भक्तों का विश्वास कुछ और है, पंडितों का अनुसंधान कुछ और, मगर उत्सव पुराना है। जो सबूत मिलते है उससे जाहिर होता है कि यह कम से कम हजारों सालों से यह पूर्व मनाकर मनुष्य अपने आप को चित्त और आनन्द से उद्वेलित करता है। इस पर्व की समाप्ति के बाद फिर वहीं हाल, या तो मनुष्य की आर्थिक संपन्नता की मंगलेच्छा पूरी नहीं हुयी है या वह सुरसा के मुंह की तरह है, जिसकी कोई सीमा नहीं होती। चाहे कोई भी परिस्थिति रही हो मनुष्य ने दीपावली मनाने का सिलसिला नहीं रोका है। पांच दिवसीय इस दीपावली पर्व के हर दिन की अलग-अलग मान्यताएं है, मगर किसी की मान्यता के पीछे लक्ष्मी अवश्य मौजूद है।
इस पर्व के पहले दिन धनतेरस यानि त्रयोदशी के बारे में शास्त्रों की मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को देव वैद्य धन्वंतरि का जन्म दिवस है। अत: आयुर्वेदिक वैद्य, आयुर्वेद प्रवर्तक भगवान धन्वंतरि की पूजा कर धन्वंतरि जयंती मनाते हैं। इसी दिन यमराज के लिए दीप दान अपमृत्यु निवारण हेतु देते हैं। लेकिन यहां भी लक्ष्मी आगमन का प्रभाव ज्यादा देखा जाता है। लक्ष्मी आगमन का प्रभाव ज्यादा देखा जाता है। लक्ष्मी आगमन का प्रारूपजन्य गृहकार्य में आने वाले नवीन बर्तन खरीदना अत्यावश्यक समझते हैं और खरीदते हैं। वास्तविकता यह है कि लक्ष्मी के सत्कार मे दो दिन पहले से ही लोग घर-दरवाजे पर दीपक जलाकर उनका आह्वान करते हैं।
दूसरे दिन के बारे में मुख्य मान्यता यह है कि यह यम चर्तुदशी है, इस दिन यह पूजन करते हैं। यमराज से निवारण के लिए लोग रसोईघर, दरवाजे जलाशय आदि स्थानों पर दीपक जलाते हैं। शास्त्र के अनुसार चंद्रोदय के बाद तिल का तेल लगाकर स्नान करने से रोगों का नाश होता है। सायं चौमुख दीपक चलाने चाहिए। यद्यपि यह भी प्रसंग है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी मंगलावार, स्वाति नक्षत्र मेष लग्र में स्वयं भगवान शिवजी ने अंजना के गर्भ से अवतार लिया है जिन्हें हनुमानजी कहते हैं। इसलिए यह चतुर्दशी हनुमतजयंती के रूप में भी मनाई जाती है। मगर न जाने कब से यह रूप चौदस बन गयी। आजकल पुरानी मान्यताएं छोड़कर सूर्योदय से पहले नहाकर अपने रूप को निखारने की परंपरा में बदल गयी है। कहते हैं महालक्ष्मी दिव्यरूपा थी। शायद इसी वजह से इसे रूप चौदस बना दिया गया।
तीसरा दिन इस पर्व का मुख्य दिन होता है। यानि महालक्ष्मी का दिन। सदियों से आर्थिक संपन्नता का समने संजोने वाले मानव के लिए यह दिन साल का सबसे महत्ती दिन होता है। भले ही वेद कुछ कहते हो, पुराण कुछ कहे या पंडितों की धारणा कुछ भी हो, सदियों से आर्थिक संपन्नता की मंगलेच्छा लिए मानव इस पर्व को अपने-अपने तरीके से यथासंभव इस तरह मनाता है कि लक्ष्मी आए और आए। महालक्ष्मी पूजन की परंपरा के पीछे यहीं धारणा प्रबल नजर आती है।
चौथा दिन भी भले ही गोर्वधन पूजा के रूप में मनाया जाता है, मगर यहां भी आर्थिक संपन्नता का सपना कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष तरीके से जुड़ा ही रहता है। चाहे ग्रामीण हो शहरी इस पर्व को समान परंपरा से मनाते हैं। इस दिन प्रात: काल ही गाय, बैल और भैसों के गोबर से गोवर्धन बनाकर पुष्पों से सजाकर उस पर दूध, दही डालकर बड़े उत्साह के साथ पूजन करते हैं। इसी दिन गृहस्थ के यहां जितने भी पशु हंै उन्हें विशेष प्रकार का भोजन देकर चित्र-विचित्र रंगों से सजावट करते हैं। राजस्थान में यह प्रथा सायंकाल के समय में बड़े उत्साह से मनाई जाती है। मोटे तौर पर देखा जाए तो यह भी संपन्नता का सपना संजोये होते है। हां एक फर्क अवश्य है कि यह संपन्नता प्राप्ति का साधन पशुपालन है।
पांचवा और अंतिम दिन भाई दूज के रूप में मनाया जाता है। यह भाई-बहन का पर्व माना जाता है। उस दिन भाई बहन के यहां जाकर बहनों के हाथ का भोजन करना श्रेयस्कर मानते हैं। सूर्य का पुत्र यमराज और पुत्री यमुना दोनों भाई-बहन हैं। किवदंती है कि यमुना के प्रार्थना पर ही यमराज ने यमुना से कहा आज के दिन जो भाई अपनी बहन के यहां भोजन करेगा, उसे यमराज का भय नहीं रहेगा। इसीलिए यह भैयादूज पर्व के नाम से जाना जाता है। मगर इन सबको भूलकर आज इस पर्व के पीछे भी अप्रत्यक्ष: प्रत्यक्ष लक्ष्मी का जुड़ाव ही है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने राजा बलि को वामन रूप में पाताल में भेजा था, तब वामन भगवान ने राजा बलि को वरदान दिया था कि वह पाताल में राजा बलि के पहरेदार बन कर रहेंगे। अब वरदान के लिए भगवान को भी पाताल जाना पड़ा। भैया दूज के दिन लक्ष्मी जी ने एक गरीब औरत का वेष बनाकर राजा बलि को भाई बनाने का आग्रह किया। जिसे बलि ने स्वीकार कर लिया। लक्ष्मीजी ने बलि को तिलक लगाकर पूजा की। जब बलि ने उनसे वरदान मांगने को कहा, तो लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को आजाद करने का वरदान मांग लिया। यानि यहां भी इस पर्व से अपना नाता जोड़ लिए तो आर्थिक समृद्धि का सपना संजाये बैठा मानव मन कैसे पीछे रहे।
जाहिर है आज हम सारी पौराणिक मान्यताएं भूलकर भौतिक चकाचौंध से प्रभावित हो अंधे होकर लक्ष्मी के पीछे दौड़ रहे हैं। किंतु आज इसका खुला दुरुपयोग हो रहा है। किसी ने सह ही कहा है आज धनादर््धमं तत: सुखम: यह आप्त वाक्य न रहकर विद्या विवादय धनं मदाय: शक्ति परेषेम पर पीडनाय: का राज्य है । साथ ही यौवनं धनसम्पति प्रभुत्वमविवेकता: का खुला तांडव नृत्य देखने में आ रहा है। ऐसा क्यों? यह एक अति विचारणीय विषय है। इसका प्रमुख कारण देखा-देखी की होड़ और विचार शक्ति की कमी है। यदि इस होड़ की तरफ से ध्यान हटाकर शांतचित्त से विचार करें तो स्वत: हृदय में जागृति पैदा होगी कि विद्या विवाद के लिए नहीं, ज्ञान के लिए, धनसंचय के लिए नहीं, दान के लिए है और शक्ति पर पीड़ा के लिए नहीं, रक्षण के लिए होनी चाहिए। क्यों भूल जाते है कि यह दीपावली पर्व हम लोगों के लिए आनंद और उजास का पर्व है। यह लक्ष्मी प्राप्ति का पर्व है। अत: इस लक्ष्मी का सदुपयोग ही श्रेयस्कर है। नहीं तोलक्ष्मी का दूसरा नाम चंचला है। वह धन का दुरुपयोग होता देखकर उस स्थान को छोडऩे में जरा भी देर नहीं लगाती। यह बात नीचे दी गयी एक पौराणिक कथा से भी साबित होती है जिसमें लक्ष्मी ने स्वयं को चंचला के रूप में स्वीकारा है। एकबार की बात है, राजा बलि समय बिताने के लिए एकान्त स्थान पर गधे के रूप में छिपे हुए थे। देवराज इन्द्र उनसे मिलने के लिए उन्हें ढूंढ रहे थे। एक दिन इन्द्र ने उन्हें खोज निकाला और उनके छिपने का कारण जानकर उन्हें काल का महत्व बताया। साथ ही उन्हें तत्वज्ञान का बोध कराया। तभी राजा लि के शरीर से एक दिव्य रूपात्मा स्त्री निकली। उसे देखकर इन्द्र ने पूछा- दैत्यराज! यह स्त्री कौन है़ देवी, मानुषी अथवा आसुरी शक्ति में से कौन-सी शक्ति है? राजा बलि बोले- देवराज! ये देवी तीनो ंशक्तियों में से कोई नहीं है। आप स्वयं पूछ लें।
इन्द्र के पूछने पर वे शक्ति बोली- देेवेन्द्र! मुझे न तो दैत्यराज बलि जानते है और न ही तुम या कोई अन्य देवगण। पृथ्वीलोक पर लोग मुझे अनेक नामों से पुकराते है। जैसे, श्री, लक्ष्मी आदि। इन्द्र बोले- देवी! आप इतने समय से राजा बलि के पास हैं लेकिन ऐसा क्या कारण है कि आप इन्हें छोड़कर मेरी ओर आ रही हैं?
लक्ष्मी बोली देवेन्द्र! मुझे मेरे स्थान से कोई भी हटा या डिगा नहीं सकता है। मैं सभी के पास काल के अनुसार आती-जाती रहती हूं। जैसा काल का प्रभाव होता है मैं उतने ही समय तक उसके पास रहती हूं। अर्थात् मैं समयानुसार एक को छोड़कर दूसरे के पास निवास करती हूं।
इन्द्र बोले देवी!आप असुरों के यहां निवास क्यों नहीं करतीं? लक्ष्मी बोली देवेन्द्र! मेरा निवास वहीं होता है जहां सत्य हो, धर्म के अनुसार कार्य होते हों, व्रत और दान देने के कार्य होते हों। लेकिन असुर भ्रष्ट हो रहे हैं। ये पहले इन्द्रियों को वश में कर सकते थे, सत्यवादी थे, ब्राह्मणों की रक्षा करते थे, पर अब इनके ये गुण नष्ट होते जा रहे हैं। ये तप- उपवास नहीं करते, यज्ञ, हवन, दान आदि से इनका कोई संबंध शेष नहीं है। पहले ये रोगी, स्त्रियों, वृद्धों, दुर्बलों की रक्षा करते थे, गुरुजन का आदर करते थे, लोगों को क्षमादान देते थे। लेकिन अब अहंकार, मोह लोभ, क्रोध, आलस्य, अविवेक, काम आदि ने इनके शरीर में जगह बना ली है। ये लोग पशु तो पाल लेते हैं। लेकिन उन्हें चारा नहीं खिलाते, उनका पूरा दूध निकाल लेते हैं, और पशुओं के बच्चे भूख से चीत्कारते हुए मर जाते हैं। ये अपने बच्चों का लालन-पालन करना भूलते जा रहे हैं। इनमें आपसी भाईचारा समाप्त हो गया है। लूट, खसोट, हत्या, व्यभिचार, कलह, स्त्रियों की पतिव्रता नष्ट करना ही इनका धर्म हो गया है। सूर्योदय के बाद तक सोने के कारण स्नान-ध्यान से ये विमुख होते जा रहे हैं। इसलिए मेरा मन इनसे उचट गया।
देवताओं का मन अब धर्म में आसक्त हो रहा है। इसएि अब मैं इन्हें छोड़कर देवताओं के पास निवास करूंगी। मेरे साथ श्रद्धा, आशा, क्षमा, दया, शान्ति, संतति, धृति और विजति ये आठों देवियां भी निवास करेंगी। देवेन्द्र! अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि मैंने इन्हें क्यों छोड़ा है। साथ ही आपको इनके अवगुणों का भी ज्ञान हो गया होगा। तब इन्द्र ने लक्ष्मी को प्रणाम किया और उन्हें आदर सहित स्वर्ग ले गए।

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